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बिटिया

Posted On: 29 Apr, 2017 कविता में

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बिटिया गरीब की, थोड़ी अजीब सी ।।

बिखरी हुई चोटी है, यह क्यों नहीं मोटी है?

इधर उधर झांके है, कोटरों में आँखे हैं

पलकें मूँद जाती हैं, रात भर जागती है
हालत इस बचपन में, कैसी हो गई अजीब सी?
बिटिया ………

सुबह निकल जाती है, साँझ ढले आती है,

पांवों के छालों को सहला भी नहीं पाती है,

चला नहीं जाता है, पांव डगमगाता है,

फुदक चलने की उमर में, बुढ़ापे के करीब सी।

बिटिया…………….

भोले-भाले बचपन में, सुखों से दूर सी,

लोग कहें फूहड़, पर माँ की तो हुर सी।

बापू की सेवा, दुखी माँ को लोरी ,

थकन उड़ जाती है, आवाज है अंगूर सी।

बिटिया………………

सोते में सपने, देखती है परियों की,

जागने पर खाक, छानती है गलियों की,

टाँकती है तारे , उदास उदास आँखों में,

पहनती है कपडे, अपने फटे सी-सी ।

बिटिया गरीब की -थोड़ी अजीब सी ।।

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